Tuesday, January 26, 2010

दुआ या ...?

उठी सुबह वो सूरज की किरण से
नयी उम्मीद का दीपक जला
भूखे पेट सुलाया कल नन्हे को
शायद आज देगी उसे दूध पिला

बेटे को फिर बांध कमर पर
पत्थर ढोती अपने सर पर
पसीना बहाती खून बहाती
ज़ख्म लगते पर ना कराहती
सूखे होठ बिखरे बाल
सूरज की तपिश से बुरा हाल

शाम हुई कुछ ठंडक लायी
मजदूरी मिलने की आस जगाई
किस्मत को लेकिन लाज ना आई
बजाये मजदूरी आज भी गालियाँ ही पाई

सर पे पत्थर के बोझ से ज्यादा
दर्द होता सीने पे पड़े वजन से
बच्चे का मुख लगा सूखे स्तन से
आज फिर निकली एक दुआ उसके मन से
जब नहीं भर सकता पेट इसका तो
फिर क्यूँ नहीं पास अपने लेता बुला
लम्बी उम्र की दुआएं सभी माँ मांगे
अपने ही अंश की मौत मांगती यह कैसी माँ

***************************************