रात के अंधियारे में
सुनसान सड़क पे
वो अक्सर है दिख जाता
गिरता पड़ता और लडखडाता
रास्ते में खम्भों से टकराता
अपनी ही धुन में मगन
अपने ही ख्यालों में डूबा
कुछ पल थमता और कुछ सोचता
फिर कुछ सोचता फिर चल पड़ता
पता नहीं किस ओर है जाना
पता नहीं कहाँ है ठिकाना
देखने वाले कहते पागल है
कोई कहता है वो शराबी
कहता कोई उसे दीवाना
कहलाता कभी सिर्फ आम आदमी था
तुमने भी दिया कोई नाम तो बतलाना
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Excellent. Keep it up Kawal
ReplyDeleteCheers,
Jagan