Monday, March 1, 2010

तुमने भी दिया कोई नाम तो बतलाना

रात के अंधियारे में
सुनसान सड़क पे
वो अक्सर है दिख जाता
गिरता पड़ता और लडखडाता
रास्ते में खम्भों से टकराता
अपनी ही धुन में मगन
अपने ही ख्यालों में डूबा
कुछ पल थमता और कुछ सोचता
फिर कुछ सोचता फिर चल पड़ता
पता नहीं किस ओर है जाना
पता नहीं कहाँ है ठिकाना
देखने वाले कहते पागल है
कोई कहता है वो शराबी
कहता कोई उसे दीवाना
कहलाता कभी सिर्फ आम आदमी था
तुमने भी दिया कोई नाम तो बतलाना

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